पत्रकारिता या राजनीति

                   पत्रकारिता या राजनीति


यह बात पूरा देश भली भांति जानता या समझता कि देश किसी अलग ही मानसिकता या विचारो की ओर जा रहा है, आज के ब्लॉग मैं पत्रकारिता के सकरात्मक और नकारात्मक पक्ष को रखने जा रहा हूँ...
यह बात भी सब लोग जानते होंगे कि देश का चौथा स्तम्भ मीडिया को कहा जाता, एक समय तक यह देश का चौथा स्तम्भ बना भी रहा, लेकिन अब यह स्तंभ इतना मजबूत नहीं रहा क्योंकि मीडिया ही दो पक्षों में बट गया, जहां तक मेरा ज्ञान है, की मीडिया या पत्रकारिता निष्पक्ष होती है, ना उनका कोई खास या पराया होता है ना वो किसी राजनीतिक दल के सदस्य होते है
         अब आपको छोटे बड़े अधिकतर पत्रकार किसी ना किसी दल से ख़ास सम्बंध रखते है, मैं आए दिन देखता हूं सोशल मीडिया पर वो पत्रकार भी है, और किसी दल के छोटे मोटे पद पर भी, असलियत मैं ये पत्रकार नहीं 200 रुपये पर किसी भी दुकान पर बिकने के लिए तैयार होते है मेरे समझ मैं ये नहीं आता कि आप उस दल का पद सम्भाल रहे है या पत्रकारिता कर रहे है।
ये उन्हें समझना होगा कि आप पत्रकारिता करने आए है किसी जी हुजूरी नहीं या आपको यही करना था तो आपने पत्रकारिता ही क्यों चुना, पूरे समय के लिए राजनीति चुन लेते,
        मैं पत्रकारिता पूरा गलत नहीं बोल रहा हूं मैं बस पत्रकारिता के रूप में किसी विशेष दल के लिए कार्य कर रहे है उनको गलत बोल रहा हूं 

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